उत्तराखंड के जंगलों में चीड़ के पेड़ों से लीसा निकालने की प्रक्रिया को लेकर गंभीर सवाल उठने लगे हैं। अल्मोड़ा से लेकर रामनगर, बाजपुर और मोरनौला क्षेत्र तक लीसे की बरामदगी के मामलों के बीच अवैध दोहन की आशंका जताई जा रही है। स्थानीय जागरूक नागरिक किशन सिंह ने जीपीएस लोकेशन के साथ वीडियो सामने रखकर आरोप लगाया है कि निजी नाप भूमि पर लीसा निकालने की अनुमति की आड़ में सरकारी बेनाप भूमि और आरक्षित वन क्षेत्रों में भी नियमों के विपरीत लीसा निकाला जा रहा है। मामले में संबंधित वन प्रभागों के बीच समन्वित जांच और जिम्मेदारों की जवाबदेही तय करने की मांग उठ रही है।
छोटे चीड़ के पेड़ों से लीसा निकालने के आरोप
किशन सिंह का आरोप है कि चिर्माख, कछियौला, खटियोला और खौड़ी के जंगलों में छोटे तथा कमजोर चीड़ के पेड़ों पर भी लीसा निकालने के लिए गमले लगाए गए हैं। उनका कहना है कि नियमों के विपरीत पेड़ों पर चीरे लगाए जाने से जंगलों को नुकसान पहुंच रहा है। उन्होंने जीपीएस लोकेशन के आधार पर संबंधित स्थलों का स्थलीय निरीक्षण कराने की मांग की है, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि लीसा निकासी निर्धारित अनुमति और नियमों के अनुरूप हो रही है या नहीं।
तीन मामलों में 1,272 टिन-कनस्तरों की बरामदगी का दावा
लीसा परिवहन से जुड़े मामलों में सामने आए आंकड़े भी जांच की जरूरत की ओर ध्यान खींचते हैं। उपलब्ध विवरण के अनुसार, रामनगर के पास 390 कनस्तर, बाजपुर में 348 कनस्तर और मोरनौला–शहरफाटक मार्ग पर एक वाहन से 534 टिन लीसा पकड़े जाने की जानकारी दी गई है।
इन तीनों मामलों में बताई गई मात्रा का कुल योग 1,272 टिन-कनस्तर है। हालांकि, इन बरामदगियों की तारीख, संबंधित विभागीय कार्रवाई और आधिकारिक अभिलेखों से आंकड़ों का मिलान किया जाना जरूरी है। इन मामलों में यह भी जांच का विषय है कि बरामद लीसा कहां से निकाला गया था और उसके परिवहन के लिए वैध दस्तावेज उपलब्ध थे या नहीं।
कछियौला में अवैध गमले लगाए जाने का मामला
कछियौला क्षेत्र में करीब 400 से 500 कथित अवैध गमले लगाए जाने का मामला भी उठाया गया है। पूर्व में कम गोलाई वाले चीड़ के पेड़ों से लीसा निकालने और करीब 130 टिन लीसा जब्त किए जाने का भी दावा किया गया है। यदि एक ही क्षेत्र में बार-बार इस तरह की अनियमितताएं सामने आ रही हैं, तो संबंधित वन क्षेत्र की निगरानी व्यवस्था और पूर्व में की गई जांचों की समीक्षा महत्वपूर्ण हो जाती है।
परिवहन पास और वन विभाग के रिकॉर्ड का हो मिलान
मामले में सबसे अहम मांग यह है कि जब्त लीसे से जुड़े परिवहन पास, ट्रांजिट परमिट और अन्य दस्तावेजों का संबंधित रेंज तथा वन प्रभागों के निकासी रजिस्टरों से मिलान कराया जाए। इससे लीसे के स्रोत, निकासी की अनुमति और परिवहन की वैधता का पता लगाने में मदद मिल सकती है।
इसके साथ ही जीपीएस लोकेशन के आधार पर संबंधित जंगलों का संयुक्त स्थलीय निरीक्षण कर पेड़ों की स्थिति, लगाए गए गमलों की संख्या और कथित अनियमितताओं का रिकॉर्ड तैयार किया जाना चाहिए। जांच में अनियमितता प्रमाणित होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सकती है।
वन विभाग की जवाबदेही पर उठे सवाल
लगातार सामने आ रहे आरोपों और लीसा बरामदगी के मामलों के बीच वन विभाग की निगरानी व्यवस्था को लेकर सवाल उठ रहे हैं। स्थानीय स्तर पर मांग की जा रही है कि संबंधित अधिकारियों की मौजूदगी में निष्पक्ष जांच कराई जाए और जांच के निष्कर्ष सार्वजनिक किए जाएं।
फिलहाल, लीसा निकासी में कथित अनियमितताओं, वन क्षेत्रों में गमले लगाए जाने और परिवहन दस्तावेजों की वैधता से जुड़े आरोपों की आधिकारिक पुष्टि तथा संबंधित विभाग का पक्ष सामने आना बाकी है। ऐसे में पूरे मामले की निष्पक्ष जांच से ही स्पष्ट हो सकेगा कि नियमों का उल्लंघन हुआ है या नहीं और यदि हुआ है, तो इसके लिए कौन जिम्मेदार है।

