सोशल मीडिया पर खबर दिखाए जाने के बाद हरकत में आया वन विभाग? GPS ने खोली पोल, अब DFO की जवाबदेही पर सवाल!

 

सोशल मीडिया पर खबर दिखाए जाने के बाद 

चीड़ के जंगलों में लीसा निकासी पर उठे सवाल, 1,272 टिनों की बरामदगी से लेकर अनुमति और निकासी के हिसाब तक जांच की मांग; सोशल मीडिया पर मामला उठने के बाद कार्रवाई की जानकारी सामने आई।

 

अल्मोड़ा।चीड़ के जंगलों में लीसा निकासी को लेकर उठे सवाल अब वन विभाग की कार्यप्रणाली और अधिकारियों की जवाबदेही तक पहुंच गए हैं। कछियौला क्षेत्र में किशन सिंह द्वारा GPS लोकेशन वाले वीडियो सोशल मीडिया पर साझा किए जाने और मामले को सोशल मीडिया पर प्रमुखता से दिखाए जाने के बाद जागेश्वर वन क्षेत्र में जांच और कार्रवाई की जानकारी सामने आई। अब सवाल है कि **क्या विभाग पहले से निगरानी कर रहा था या मामला सार्वजनिक होने के बाद ही कार्रवाई तेज हुई?

DFO की निगरानी पर सवाल, कार्रवाई के बाद भी अधूरा हिसाब!

सिविल सोयम वन प्रभाग, अल्मोड़ा के DFO प्रदीप धोलाखंडी की निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, संबंधित पेड़ों को चिह्नित करने, अपराध दर्ज करने और निर्धारित मात्रा से अतिरिक्त पाए गए लीसे को जब्त कर धौलादेवी मोटर मार्ग स्थित लीसा डिपो में जमा कराने की कार्रवाई हुई। संबंधित लीसा छेवक के दूसरे नाप क्षेत्रों की जांच और उसे काली सूची में डालने के लिए पत्र भेजने की बात भी सामने आई है।

लेकिन क्या अनुमति के दायरे, GPS लोकेशन, स्वीकृत पेड़ों और वास्तविक निकासी का मिलान हुआ? दूसरे क्षेत्रों की जांच में क्या मिला और निगरानी में कमी के लिए जिम्मेदारी किसकी तय होगी? DFO कार्यालय को कार्रवाई के साथ जांच के निष्कर्ष भी स्पष्ट करने चाहिए।

 1,272 लीसा टिनों की बरामदगी, स्रोत का हिसाब कौन देगा?

जानकारी के अनुसार, रामनगर में 390, बाजपुर में 348 और मोरनौला–शहरफाटक मार्ग पर 534 लीसा टिन पकड़े गए थे। कुल संख्या 1,272 टिन है। इन बरामदगियों को कछियौला प्रकरण से जोड़ने का प्रत्यक्ष प्रमाण सामने नहीं है, लेकिन ये मामले लीसा निकासी, परिवहन और भंडारण की निगरानी पर सवाल जरूर उठाते हैं।

क्या जब्त लीसे के स्रोत, परिवहन अनुमति और डिपो में जमा मात्रा की जांच हुई? क्या संबंधित रिकॉर्ड का मिलान किया गया?

अनुमति की आड़ में नियमों की अनदेखी तो नहीं?

निजी नाप भूमि की अनुमति के दायरे से बाहर लीसा निकासी किए जाने की आशंकाओं की जांच जरूरी है। पेड़ों की गोलाई, तनों पर बने चीरे, स्वीकृत संख्या और GPS लोकेशन का सत्यापन होना चाहिए। वीडियो के आधार पर दोष तय नहीं किया जा सकता, लेकिन शिकायतों की निष्पक्ष जांच और अनियमितता प्रमाणित होने पर कार्रवाई जरूरी है।

वन विभाग से सीधे सवाल

– सोशल मीडिया पर मामला सामने आने से पहले नियमित निरीक्षण हुआ था या नहीं?

– कितने पेड़ों की जांच हुई और कितनी मात्रा में लीसा जब्त किया गया?

– दूसरे क्षेत्रों की जांच पूरी हुई या अभी लंबित है?

– निगरानी करने वाले अधिकारियों और कर्मचारियों की जवाबदेही कैसे तय होगी?

– लीसा टिनों की बरामदगी के मामलों में उनके स्रोत की जांच का क्या परिणाम रहा?

सोशल मीडिया पर मामला सामने आने के बाद कार्रवाई की जानकारी जरूर आई, लेकिन अब पूरे हिसाब का खुलासा जरूरी है।** वन विभाग को अनुमति-पत्रों, निरीक्षण रिपोर्ट, जब्ती के आंकड़ों और जांच के निष्कर्षों से स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए। यदि सब कुछ नियमों के अनुसार हुआ है तो रिकॉर्ड सामने रखा जाए और यदि अनियमितताएं प्रमाणित होती हैं तो जिम्मेदारों पर नियमानुसार कार्रवाई हो। आखिर जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिस विभाग पर है, उसकी निगरानी व्यवस्था पर उठे सवालों का जवाब कौन देगा?