कालाढूंगी कॉर्बेट सफारी गेट पर JCB से निर्माण कार्य, अनुमति और टेंडर प्रक्रिया पर उठे सवाल 8 से 10 लाख रुपये के निर्माण कार्य की चर्चा, क्या काम शुरू होने के बाद तैयार हुआ वर्क ऑर्डर? जांच के बाद ही सामने आएगी पूरी सच्चाई

रामनगर वन प्रभाग की ऐतिहासिक कालाढूंगी रेंज के कॉर्बेट जंगल सफारी गेट पर जेसीबी की घड़घड़ाहट और लगभग आठ से दस लाख रुपये की लागत से चल रहे निर्माण कार्यों ने महकमे की कार्यशैली पर मुसकुराते हुए बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आरक्षित वन क्षेत्र के भीतर बिना किसी पूर्व प्रशासनिक अनुमति और टेंडर प्रक्रिया के अचानक मशीनें उतार देने के इस खेल में चर्चाओं का बाजार गर्म है। लोग दबी जुबान में कह रहे हैं कि इस पूरे मामले में वही पुराना फिल्मी अंदाज दोहराया जा रहा है, जहां पर्दे के पीछे के असली खिलाड़ी अमर, अकबर और एंथनी की तरह एक ही ‘मास्टरमाइंड’ यानी किशनलाल की संतानें हैं। यह तिकड़ी ऐसी मायावी है कि जंगल के हर छोटे-बड़े कोटेशन की लॉटरी हर बार घूम-फिरकर इन्हीं के हाथ लगती है, मानो विभाग में ठेकों का सूखा सिर्फ इन्हीं के लिए हरा-भरा रहता हो।

मामले का सबसे दिलचस्प और हास्यास्पद मोड़ तब सामने आया जब खबर उड़ते ही महकमे में कागजों को दुरुस्त करने की ऐसी फुर्ती दिखाई गई कि किसी फिल्मी पटकथा को भी मात दे दे। चर्चा है कि जैसे ही मीडिया की नजर इस पर पड़ी, संबंधित क्षेत्र प्रभारी के नाम पिछली तारीखों में वर्क ऑर्डर तैयार करने का हुनर दिखा दिया गया। अब इस तारीखों के खेल को देखकर हर कोई यही कयास लगा रहा है कि जब काम पहले ही शुरू हो चुका था और कागजों की माला बाद में पिरोई गई, तो इस पूरे कारनामे की मलाई आखिर किस चहेते के खाते में जाएगी। सूत्र तंज कसते हुए यह भी कह रहे हैं कि परिणाम चाहे जो आए, इस कलाबाजी के अंत में भी वही नाम चमकते हुए बाहर आएंगे जो हर बार विभागीय लॉटरी के इकलौते हकदार साबित होते हैं।

आरक्षित वन क्षेत्र में इस तरह नियमों को ताक पर रखकर जेसीबी चलाने का यह कारनामा और लाखों के बजट का यह गणित अब गली-मोहल्लों की हंसी का पात्र बन चुका है। काम की अनुमानित लागत, मशीनों के चलने के घंटे और माप पुस्तिका के पन्नों पर दर्ज होने वाली इबारत सब अंदरखाने तय हो चुकी है, बस औपचारिकताएं पूरी होना बाकी है। जब यह सवाल पूछा जाता है कि बिना किसी विधिवत निविदा के इस काम को आखिर किसने हरी झंडी दिखाई, तो हर कोई मुस्कुराकर यही जवाब देता है कि जब तीन भाइयों की जोड़ी मैदान में हो, तो कागजी अनुमति जैसी छोटी-मोटी बाधाएं खुद-ब-खुद रास्ते से हट जाती हैं। भुगतान के बिल किसके नाम से पास होंगे और मलाईदार रकम किसके गुप्त बक्से में जाएगी, इसका अंदाजा भी हर समझदार नागरिक आसानी से लगा रहा है।

अब निगाहें रामनगर वन प्रभाग के मुखिया और प्रभागीय वनाधिकारी ध्रुव सिंह मर्तोलिया के अगले कदम पर टिकी हैं कि वे इस कागजी और धरातलीय खेल की कितनी गहराई तक जाकर जांच कराते हैं। क्या वे वर्क ऑर्डर की असली तारीखों के रहस्यों से पर्दा उठाएंगे या फिर यह फाइल भी हमेशा की तरह किसी बंद बक्से में धूल फांकती रह जाएगी। लोग चाय की चुस्कियों के साथ बस यही कयास लगा रहे हैं कि जाँच का परिणाम चाहे जो निकले, अंत में जीत उसी अमर-अकबर-एंथनी वाली तिकड़ी की होनी तय है, जो हर बार बिना किसी खरोंच के विभाग की तिजोरी से मलाई बटोर ले जाती है। कालाढूंगी सफारी गेट पर मशीनें चलने का यह मनोरंजन अब तब तक जारी रहेगा जब तक असली हकदारों के चेहरे से नकाब नहीं हट जाता।