कालाढूंगी/चकलुवा। देर शाम चकलुवा क्षेत्र के ग्राम हरिपुर में वन विभाग और पुलिस की गाड़ियों के सायरन से अचानक हलचल मच गई। वन विभाग की टीम ने एक खेत में पहुंचकर तलाशी अभियान चलाया। कार्रवाई के दौरान खेत से करीब चार दर्जन सागौन के गिलटे बरामद होने की बात सामने आई है।
वन विभाग ने बरामद लकड़ी को कब्जे में लेकर जांच शुरू कर दी है। मौके पर विभागीय टीम के साथ पुलिस की मौजूदगी भी रही। कार्रवाई तेजतर्रार SDO किरन शाह के नेतृत्व में किए जाने की जानकारी है।
आखिर खेत तक कैसे पहुंची इतनी मात्रा में सागौन?
करीब चार दर्जन सागौन के गिलटों की बरामदगी के बाद सबसे बड़ा सवाल यही है कि इतनी मात्रा में लकड़ी आखिर आई कहां से?
क्या यह लकड़ी किसी वैध स्रोत से खरीदी गई थी या फिर अवैध कटान से इसका संबंध है? यदि लकड़ी वैध तरीके से लाई गई थी तो उसके खरीद, स्वामित्व और परिवहन से जुड़े दस्तावेज कहां हैं? क्या मौके पर मौजूद लकड़ी और दस्तावेजों का विभागीय रिकॉर्ड से मिलान कराया जाएगा?
क्या वन क्षेत्र से कटान की भी होगी जांच?
जांच का एक अहम पहलू यह भी होगा कि बरामद गिलटों की लकड़ी किस स्थान से काटी गई। क्या इनके कटान के निशान किसी खास क्षेत्र की ओर इशारा करते हैं? क्या आसपास के वन क्षेत्रों में हाल के दिनों में सागौन के पेड़ों की कटान या चोरी की कोई सूचना दर्ज हुई है?
अगर लकड़ी का संबंध वन क्षेत्र से सामने आता है तो संबंधित बीट और क्षेत्र के रिकॉर्ड की भी जांच जरूरी होगी।
विभागीय निगरानी पर भी उठे सवाल
इस बरामदगी ने वन विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। यदि जांच में लकड़ी का संबंध अवैध कटान से सामने आता है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित क्षेत्र में तैनात फॉरेस्टर और फॉरेस्ट गार्ड की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी थी?
क्या नियमित गश्त और चेकिंग की जा रही थी?
क्या क्षेत्र में लकड़ी के अवैध कारोबार की कोई भनक विभागीय अमले को पहले से थी?
अगर थी तो कार्रवाई पहले क्यों नहीं हुई?
और अगर नहीं थी, तो इतनी बड़ी मात्रा में सागौन की लकड़ी विभागीय निगरानी से कैसे बचती रही?
क्या किसी विभागीय कर्मचारी की मिलीभगत की भी होगी जांच?
मामले का सबसे गंभीर पहलू यह है कि यदि जांच में लकड़ी अवैध स्रोत से आने की पुष्टि होती है तो विभाग को यह भी देखना होगा कि कहीं इस पूरे नेटवर्क को किसी स्तर पर विभागीय संरक्षण या मिलीभगत तो नहीं मिली।
हालांकि फिलहाल किसी कर्मचारी की संलिप्तता की पुष्टि नहीं हुई है और इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा। लेकिन चार दर्जन के करीब गिलटों की बरामदगी के बाद यह सवाल जरूर उठ रहा है कि इतनी मात्रा में लकड़ी का कटान, परिवहन और भंडारण क्या बिना किसी नेटवर्क के संभव था?
अब जांच की दिशा पर टिकी नजर
पश्चिमी वृत्त हल्द्वानी के वन संरक्षक नितेश मणि त्रिपाठी के निर्देशन में तथा DFO उमेश तिवारी की टीम की सक्रियता के बाद अब निगाहें जांच के अगले चरण पर हैं।
वन विभाग को बरामद लकड़ी की प्रजाति, गिलटों की वास्तविक संख्या, आकार, कटान के निशान और उनकी संभावित उत्पत्ति की जांच करनी होगी। साथ ही यह भी पता लगाना होगा कि लकड़ी खेत तक किस माध्यम से पहुंची और इसे आगे कहां भेजे जाने की तैयारी थी।
हरिपुर में लकड़ी की बरामदगी कार्रवाई का पहला चरण है, लेकिन असली सवाल अब शुरू होते हैं—सागौन आई कहां से? किसने काटी? किसने पहुंचाई? किसके लिए रखी गई थी? और यदि इसमें अवैध कटान की पुष्टि होती है तो इसकी भनक संबंधित क्षेत्र के जिम्मेदार वनकर्मियों को क्यों नहीं लगी?
इन सवालों के जवाब विभागीय जांच पूरी होने के बाद ही सामने आएंगे।

