उत्तराखंड का रामनगर वन प्रभाग और उसकी कालाढूंगी रेंज इन दिनों एक ऐसी प्रशासनिक नौटंकी का मंच बनी हुई है, जिसे देखकर जंगल के जानवर भी हैरान होंगे। जिस वन महकमे की पूरी रोज़ी-रोटी ‘पर्यावरण संरक्षण’ और ‘वन्यजीव बचाओ’ के उपदेशों पर टिकी है, वही महकमा अब अपने ही घर में बजती भारी-भरकम जेसीबी की घड़घड़ाहट पर कान में तेल डाले बैठा है।
आम इंसान अगर जंगल के किनारे ज़रा तेज़ आवाज़ में बोल दे या गाड़ी का हॉर्न बजा दे, तो महकमे का कानून तुरंत जाग जाता है। चालान की पर्चियां कटने लगती हैं और उपदेशों की बौछार शुरू हो जाती है कि वन्यजीवों को शांति पसंद है, उनके आवास में खलल मत डालो। लेकिन जब उसी आरक्षित जंगल के भीतर, सफारी के रास्तों पर जेसीबी जैसी दानवी मशीनें दहाड़ती हैं, तब अफसरों का यह सारा ज्ञान न जाने किस बिल में जाकर छिप जाता है।
कहानी सिर्फ़ मशीन चलने भर की नहीं है, कहानी उस दुस्साहस और अंधी व्यवस्था की है जो जंगल के पहरेदारों की नाक के नीचे पनप रही है। चर्चा तो यहां तक है कि किसी साहब के चहेते या कथित दबंग ठेकेदार ने बिना किसी कार्यादेश, बिना किसी लिखित अनुमति के सीधे जंगल के भीतर जेसीबी उतार दी।
अब ज़रा सोचिए, आरक्षित वन क्षेत्र कोई शहर का चौराहा तो है नहीं कि कोई भी अपनी गाड़ी लेकर घुसा और काम शुरू कर दिया। जंगल के गेट का ताला अपने आप तो टूटता नहीं, और न ही जेसीबी इतनी छोटी है कि जेब में रखकर अंदर पहुंचा दी जाए।
आखिर वो कौन सा मेहरबान अफ़सर था जिसने एंट्री गेट पर आंखें मूंद लीं? किसने उस भारी मशीन को रास्ता दिखाया? जब जंगल की ज़मीन पर मशीन चल रही थी, तब गश्त करने वाले वनकर्मी कहां गुलछर्रे उड़ा रहे थे? और अगर महकमे को सब पता था, तो वो कौन सी ऐसी ‘गुप्त अनुमति’ है जिसे कागज़ों में छिपाकर रखा गया है?
कानून की बड़ी-बड़ी किताबें झाड़ने वाले अफसरों को ज़रा वन (संरक्षण एवं संवर्धन) अधिनियम की धारा 2 की याद भी दिला देनी चाहिए। नियम साफ कहते हैं कि वन भूमि पर किसी भी गैर-वानिकी काम के लिए केंद्र सरकार तक की मंज़ूरी की ज़रूरत होती है।
माना कि जंगल के रखरखाव और सफारी के रास्तों की सफाई के लिए कुछ राहतें दी जाती हैं, लेकिन सफाई के नाम पर जेसीबी से जंगल का सीना छलनी कर देना कहां का प्रबंधन है? अगर यह काम पूरी तरह कानूनी था, तो आदेश की कॉपी सार्वजनिक करने में हाथ क्यों कांप रहे हैं? कागज़ सामने रख दीजिए, दूध का दूध और पानी का पानी अपने आप हो जाएगा।
लेकिन सच तो यह है कि कागज़ होंगे ही नहीं, क्योंकि यहां तो हुकुम सीधे ज़बानी चलते हैं और नियम सिर्फ कागज़ों की शोभा बढ़ाते हैं।
सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसलों की दुहाई देना इन अफसरों का पसंदीदा काम है। टी.एन. गोदावर्मन मामले का नाम लेकर बड़े-बड़े सेमिनार आयोजित किए जाते हैं और पर्यावरण पर भाषण दिए जाते हैं। लेकिन जब धरातल पर कानून का पालन कराने की बारी आती है, तो सुप्रीम कोर्ट की सारी गाइडलाइन्स ताक पर रख दी जाती हैं।
सर्वोच्च अदालत ने साफ़ कहा है कि वन क्षेत्र में होने वाली हर गतिविधि वैधानिक मंज़ूरी और तय मानकों के हिसाब से ही होनी चाहिए। कालाढूंगी में जो हुआ, क्या वो सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का मज़ाक उड़ाना नहीं है? अदालत के फैसलों का नाम जपना आसान है, लेकिन उनके मुताबिक काम करके दिखाना बहुत मुश्किल, और यही रामनगर वन प्रभाग की सबसे बड़ी नाकामी है।
वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 भी चिल्ला-चिल्लाकर कहता है कि जानवरों के कुदरती ठिकाने के साथ खिलवाड़ जुर्म है। भारी मशीनों की तेज़ आवाज़ और धुएं से जब बेज़ुबान जानवर सहमकर भागते हैं, तो उसकी भरपाई कौन करेगा? आरक्षित वन और अभयारण्य की तकनीकी परिभाषाओं में उलझाकर अफसर भले ही अपना बचाव कर लें, लेकिन सच यही है कि उस दिन जंगल की शांति और वन्यजीवों के अधिकार की धज्जियां उड़ाई गईं।
अगर जेसीबी चलने से पेड़-पौधों, मिट्टी या जानवरों की शांति को नुकसान पहुंचा है, तो इसकी सीधी ज़िम्मेदारी महकमे के उन अफ़सरों पर तय होनी चाहिए जो उस वक्त एसी कमरों में बैठकर खर्राटे ले रहे थे।
अब रामनगर वन प्रभाग के साहबों को जवाब देना ही होगा। सीधे-सीधे सवाल हैं कि क्या जेसीबी चलाने का कोई लिखित आदेश था? किस अफ़सर ने हरी झंडी दिखाई? क्या मौके का निरीक्षण करने का नाटक भी किया गया था? और अगर कोई इजाज़त नहीं थी, तो आपकी चौकस गश्त के बावजूद मशीन अंदर कैसे घुस गई? सच छुपाने की कोशिश में मामला और बदबूदार होता जा रहा है।
अगर आप पाक-साफ़ हैं तो आदेश की कॉपी टेबल पर रखिए, वरना यह मान लीजिए कि जंगल का कानून अब जानवरों का नहीं, बल्कि जेसीबी चलाने वाले ठेकेदारों का गुलाम बन चुका है। बेज़ुबान जानवरों की शांति छीनने वाली इस गूंज के पीछे असली मास्टरमाइंड कौन है, इसका बेनकाब होना अभी बाकी है।

